कोटपूतली-बहरोड़ (राजस्थान) — यूपीएससी 2025 के परिणाम के बाद जहां देशभर में सफल अभ्यर्थियों का सम्मान हो रहा था, वहीं राजस्थान के बानसूर क्षेत्र में एक युवक द्वारा खुद को आईएएस चयनित बताने का मामला सामने आया है। जांच में यह दावा पूरी तरह फर्जी निकला, जिससे पूरे इलाके में चर्चा और हैरानी का माहौल बन गया।
रिजल्ट के बाद गांव में जश्न, बना हीरो
यूपीएससी का रिजल्ट घोषित होते ही बानसूर के नांगल भाव सिंह गांव में रहने वाले निशांत कुमार ने दावा किया कि उसने ऑल इंडिया रैंक 899 हासिल की है। इस खबर के बाद गांव में खुशी का माहौल बन गया। मिठाइयां बांटी गईं, ढोल-नगाड़ों के साथ जुलूस निकाला गया और ग्रामीणों ने उसे कंधों पर बैठाकर सम्मानित किया।

स्थानीय जनप्रतिनिधि और पूर्व मंत्री तक उसे बधाई देने पहुंचे। मंच से उसने अपनी संघर्ष की कहानी सुनाते हुए युवाओं को प्रेरित भी किया।
मोटिवेशनल स्पीच में सुनाई बनाई हुई कहानी
निशांत ने दावा किया कि उसने कई असफलताओं के बाद 2025 में प्री, मेंस और इंटरव्यू पास कर लिया। उसने अपनी सफलता का श्रेय परिवार, दोस्तों और ऑनलाइन स्टडी प्लेटफॉर्म्स को दिया। यहां तक कि उसने कोचिंग और तैयारी के तरीकों का भी विस्तार से जिक्र किया, जिससे लोगों को उस पर पूरा भरोसा हो गया।

जांच में सामने आई सच्चाई
मीडिया जांच में जब उसके दावों की पड़ताल की गई, तो कई गड़बड़ियां सामने आईं।
जिस 899 रैंक का वह दावा कर रहा था, वह किसी अन्य अभ्यर्थी की निकली।
असली अभ्यर्थी उत्तर प्रदेश के आगरा शहर का निवासी पाया गया।
निशांत ने भरोसा दिलाने के लिए एडमिट कार्ड में रोल नंबर तक एडिट कर दिया।
उसने AI टूल्स की मदद से फर्जी फोटो भी तैयार की, जिसमें वह यूपीएससी दफ्तर के बाहर खड़ा नजर आ रहा था।

असली टॉपर की पहचान
जांच में सामने आया कि 899वीं रैंक पाने वाला असली उम्मीदवार आगरा का रहने वाला है और वह पहले से ही एक सरकारी पद पर कार्यरत है। उससे बातचीत में स्पष्ट हुआ कि बानसूर के युवक का दावा पूरी तरह झूठा है।
सवालों के बाद कबूला सच
जब फर्जी दावा करने वाले युवक से सख्ती से सवाल किए गए, तो उसने आखिरकार अपनी गलती स्वीकार कर ली। उसने माना कि उसने लोगों को भ्रमित किया और गलत तरीके से खुद को आईएएस चयनित बताया।

सोशल मीडिया और जल्दबाजी बनी वजह
इस पूरे मामले में यह भी सामने आया कि बिना आधिकारिक पुष्टि के सोशल मीडिया पर बधाइयों की बाढ़ आ गई। स्थानीय स्तर पर भी किसी ने तथ्य जांचने की कोशिश नहीं की, जिससे यह झूठ तेजी से फैल गया।
यह मामला युवाओं और समाज के लिए एक बड़ा सबक है कि किसी भी सफलता की खबर को स्वीकार करने से पहले उसकी आधिकारिक पुष्टि जरूरी है। साथ ही यह भी दिखाता है कि तकनीक का गलत इस्तेमाल कैसे लोगों को गुमराह कर सकता है।
बानसूर का यह मामला केवल एक फर्जी दावे तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सामाजिक और डिजिटल जागरूकता की कमी को भी उजागर करता है। जहां एक ओर असली मेहनती अभ्यर्थी अपनी सफलता के लिए संघर्ष करते हैं, वहीं ऐसे फर्जी दावे उनके प्रयासों की अहमियत को कम करने की कोशिश करते हैं।








