राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर हलचल तब तेज हो गई जब बाड़मेर के चर्चित युवा विधायक रविंद्र सिंह भाटी की सुरक्षा व्यवस्था में अचानक कमी कर दी गई। हाल ही में जारी प्रशासनिक आदेश के अनुसार, उन्हें अब पहले की तरह चार नहीं बल्कि केवल एक निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) ही उपलब्ध रहेगा। इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों के साथ-साथ उनके समर्थकों में भी चर्चा और नाराजगी देखने को मिल रही है।
आदेश में क्या कहा गया है?
बाड़मेर जिला पुलिस अधीक्षक कार्यालय से जारी आदेश (दिनांक 13 अप्रैल 2026) में बताया गया कि यह निर्णय राज्य सरकार के निर्देशों और इंटेलिजेंस इनपुट के आधार पर लिया गया है। आदेश के मुताबिक, अब प्रदेश के सांसदों और विधायकों को एक समान सुरक्षा व्यवस्था के तहत केवल एक-एक पीएसओ ही दिया जाएगा।
पहले भाटी को संभावित खतरे को देखते हुए अतिरिक्त सुरक्षा दी गई थी, जिसमें तीन अन्य सुरक्षाकर्मी शामिल थे। लेकिन नई नीति लागू होने के बाद इन अतिरिक्त सुरक्षाकर्मियों को वापस बुला लिया गया है।

पहले क्यों दी गई थी अतिरिक्त सुरक्षा?
सूत्रों के अनुसार, कुछ समय पहले विधायक भाटी को सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से धमकियां मिली थीं। इसी के आधार पर सुरक्षा एजेंसियों ने उन्हें अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान की थी। उस समय इंटेलिजेंस इनपुट में संभावित खतरे की बात सामने आई थी।
अब जब सुरक्षा घटाई गई है, तो यह सवाल उठ रहा है कि क्या खतरे का स्तर कम हो गया है या फिर यह केवल नीति में बदलाव के कारण लिया गया प्रशासनिक फैसला है।
ओरण आंदोलन से जुड़ रहा मामला
हाल के दिनों में रविंद्र सिंह भाटी ‘ओरण बचाओ’ मुद्दे को लेकर काफी सक्रिय रहे हैं। जैसलमेर और बाड़मेर क्षेत्र में ओरण भूमि को बचाने को लेकर उन्होंने सरकार के खिलाफ खुलकर आवाज उठाई है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सुरक्षा में कटौती का समय इस आंदोलन के साथ मेल खा रहा है, जिससे इस फैसले के पीछे राजनीतिक संकेत होने की चर्चाएं भी तेज हो गई हैं। हालांकि, प्रशासन की ओर से इस तरह के किसी भी आरोप की पुष्टि नहीं की गई है।
समर्थकों में नाराजगी
जैसे ही यह खबर सामने आई, सोशल मीडिया पर भाटी समर्थकों ने सरकार और प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जताई। समर्थकों का कहना है कि एक ऐसे नेता, जो लगातार जनसभाओं और दौरे में सक्रिय रहता है, उसकी सुरक्षा कम करना जोखिम भरा हो सकता है।
प्रशासन का पक्ष
पुलिस प्रशासन का कहना है कि यह फैसला पूरी तरह से नियमों के अनुसार लिया गया है और सभी जनप्रतिनिधियों के लिए एक समान नीति लागू की जा रही है। उनके अनुसार, यह किसी एक व्यक्ति विशेष को ध्यान में रखकर नहीं बल्कि पूरे सिस्टम में एकरूपता लाने के उद्देश्य से किया गया कदम है।
बड़ा सवाल क्या है?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि:
जब पहले खतरे की बात सामने आई थी, तो अब अचानक सुरक्षा क्यों घटाई गई?
क्या इंटेलिजेंस इनपुट में बदलाव हुआ है?
या यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा है?
रविंद्र सिंह भाटी की सुरक्षा में की गई यह कटौती फिलहाल प्रशासनिक निर्णय के रूप में सामने आई है, लेकिन इसके समय और परिस्थितियों ने इसे राजनीतिक बहस का मुद्दा बना दिया है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या इस फैसले पर पुनर्विचार होता है या मामला इसी तरह आगे बढ़ता है।








