भारत के चंद्रयान-3 की तरह ही रूस ने भी चंद्रमा पर मिट्टी की जांच और पानी की खोज के लिए लिए 47 साल बाद अपना मून मिशन लॉन्च किया है। 1976 के बाद 2023 में जाकर रूस अपना मून मिशन लूना-25 चंद्रमा पर लैंड करवाने की तैयारी कर रहा है। रूस की अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस ने जानकारी दी है कि इस मिशन का उद्देश्य सॉफ्ट-लैंडिंग तकनीक का विकास करना है इसके साथ ही चंद्रमा की आंतरिक सतह की जांच करना और चंद्रमा पर पानी के साथ साथ अन्य संभावनाओं की खोज करना है। जिसके लिए लेंडर करीब एक साल तक चंद्रमा की सतह पर कार्य करेगा।
पिछली बार 1976 में किया गया मून मिशन लूना-24 चंद्रमा से 170 gm मिट्टी के साथ सुरक्षित पृथ्वी पर पहुँचा था। वहीं इस बार लूना-25 चंद्रमा पर एक साल तक चंद्रमा की आंतरिक सतह की जांच करेगा। वहीं चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह पर 14 दिन तक मिट्टी का अध्ययन और पानी की खोज करेगा। रूसी वैज्ञानिक के अनुसार रूस के लूना-25 मिशन की सफलता की संभावना 50 प्रतिशत है।
भारत का चंद्रयान-3 और रूस के लूना-25 की चंद्रमा पर लैंडिंग की संभावित तारीख 23 अगस्त है। रूसी स्पेस एजेंसी रोस्कोस्मोस ने रॉयटर्स को बताया कि चंद्रमा के ध्रुव पर लैन्डिंग करने से पहले लूना-25 चंद्रमा की कक्षा में 5-7 दिन बिताएगा, फिर ध्रुव पर तीन लैंडिंग स्थलों में से एक पर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा। इससे पहले 8 अगस्त को इसरो चीफ एस. सोमनाथ ने बताया था कि चंद्रयान-3 का लेंडर सभी सेंसर और इंजनों के बावजूद भी 23 अगस्त को चंद्रमा पर सॉफ्ट लैंडिंग करेगा। यह बात तो स्पष्ट है कि दोनों देशों के लेंडर अलग अलग लैंडिंग स्थलों पर लेंड करेंगे लेकिन अभी निश्चित समय की जानकारी नहीं दी गई है।

रॉयटर्स ने रोस्कोस्मोस के हवाले से कहा है कि रोस्कोस्मोस के अनुसार दोनों मिशन (चंद्रयान-3 और लूना-25) एक दूसरे के रास्ते में नहीं आएंगे। ‘ऐसा कोई खतरा नहीं है कि वे एक-दूसरे के साथ हस्तक्षेप करें या टकराएं. चंद्रमा पर सभी के लिए पर्याप्त जगह है’, रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कोस्मोस ने कहा।
चंद्रयान-3 में लैंडर, रोवर और प्रोपल्शन मॉड्यूल है। लैंडर और रोवर चंद्रमा की सतह पर लैंड करेंगे और चंद्रमा का अध्ययन करेंगे जबकि प्रोपल्शन मॉड्यूल चंद्रमा की कक्षा में रहकर ही पृथ्वी से आने वाली रेडीऐशन की जांच करेगा। भारत का यह तीसरा चंद्र मिशन यह अध्ययन करेगा कि चंद्रमा पर भूकंप कैसे आते है, इसके अलावा चंद्रमा की मिट्टी का अध्ययन और चंद्रमा पर पानी की संभवनाओं को खोजेगा। चंद्रयान-3 का लैंडर चंद्रमा पर 14 दिन तक अध्ययन करेगा और फिर सुरक्षित पृथ्वी पर लौट आएगा।

वहीं रूस के लूना-25 मिशन में लैंडर और रोवर है जो चंद्रमा के ध्रुव पर मिट्टी का अध्ययन करेगा और पानी की उपलब्धता की संभावना की भी जांच करेगा। यह मिशन करीब एक साल तक चंद्रमा पर रहेगा।
रूस का लूना-25 और भारत का चंद्रयान-3 चंद्रमा के साउथ पोल पर सॉफ्ट लैंडिंग करेंगे। आज तक दुनिया में जो भी चंद्र मिशन हुए है वो सभी इक्वैटर पर लैंड हुए है जबकि भारत का चंद्रयान-3 और रूसी लूना-25 पहली बार चांद के साउथ पोल पर लैंडिंग करने जा रहे है। NASA ने 2018 में अनुमान लगाया था कि चाँद के साउथ पोल पर पानी की उपस्थिति है।
चंद्रमा के ध्रुवीय क्षेत्र चंद्रमा के बाकी भाग से काफी अलग है। वहाँ कई ऐसे क्षेत्र है जहां कभी भी रोशनी नहीं पहुँचती है और तापमान -200 डिग्री से भी नीचे चला जाता है। इसलिए अनुमान लगाया जाता है कि ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा हुआ पानी हो सकता है। वहीं भारत के 2008 में लॉन्च किए गए चंद्रयान-1 मिशन ने चंद्रमा की सतह पर पानी होने के संकेत भी दिए थे।








