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मुस्लिमो को अब तलाक देना पड़ेगा भारी, सुप्रीम कोर्ट का आया इतना सक्त आदेश

मुस्लिमो को अब तलाक देना पड़ेगा भारी, सुप्रीम कोर्ट का आया इतना सक्त आदेश
मुस्लिमो को अब तलाक देना पड़ेगा भारी, सुप्रीम कोर्ट का आया इतना सक्त आदेश

मुस्लिमो को अब तलाक देना पड़ेगा भारी

मुस्लिमो को अब तलाक देना पड़ेगा भारी ; भारत मे पहले ही तीन तलाक को लेकर कानूनी जंग चल रही है इसी बीच सुप्रीम कोर्ट का ये आदेश अब तलाक पर अंकुश लगाने मे रामबाण साबित होगा , जहा पहले मुस्लिम पुरुष महिलाओ को आसानी से तलाक देकर छोड़ दिया करते थे तथा महिलाओ को हालाल जेसी कठोर नियमों से गुजरना पड़ता था लेकिन आज का सुप्रीम कोर्ट का फेसल उन असहाय महिलाओ को जरूर सहारा देगा जानिए क्या है पूरा फेसला 

आज सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के हित में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। कोर्ट ने निर्णय दिया कि ऐसी महिलाएं CRPC की धारा 125 के तहत अपने पति से भोजन की मांग कर सकती हैं। वह गुजारा भत्ता प्राप्त करेंगे। देश की सर्वोच्च अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि सेकुलर कानून ही लागू होंगे।


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फैसला देते हुए, जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टिन गॉर्ज मसीह की पीठ ने कहा कि मुस्लिम महिलाएं गुजारा भत्ता पा सकती हैं। उन्हें सीआरपीसी की धारा 125 का उपयोग करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि ये नियम सभी विवाहित महिलाओं पर लागू होते हैं, चाहे उनका धर्म कोई भी हो।

आपको बता दें कि एक मुस्लिम शख्स ने पत्नी को गुजारा भत्ता देने के तेलंगाना हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। उसने दलील दी थी कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका दायर करने की हकदार नहीं है। महिला को मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 अधिनियम के प्रावधानों के तहत ही चलना होगा। लेकिन कोर्ट ने ऐसे मामलों में सीआरपीसी की धारा 125 को प्राथमिकता दी।


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पीठ ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम 2019 का सहारा ले सकती है यदि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत याचिका लंबित रहने के दौरान वह तलाकशुदा हो जाती है। पीठ ने निर्णय दिया कि सीआरपीसी की धारा 125 के तहत किए गए उपायों से यह अधिनियम अलग है।


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शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही धर्मनिरपेक्ष सीआरपीसी की धारा 125 को मान्यता दी, जो मुस्लिम महिलाओं पर भी लागू होती है। इसके बावजूद, मुस्लिम महिला अधिनियम 1986 में खारिज कर दिया गया था, लेकिन 2001 में यह फिर से लागू हो गया था। इस खबर को ओर अधिक पढ़ने के लिए यह क्लिक करे तथा हमसे जुड़े

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