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राजस्थान में पंचायत चुनाव टलने के आसार 1900 करोड़ का केंद्रीय फंड अटक सकता है, कई ग्रामीण योजनाएं होंगी प्रभावित...

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जयपुर: राजस्थान में आगामी पंचायत चुनावों को लेकर अनिश्चितता की स्थिति बनती नजर आ रही है। राज्य में 15 अप्रैल से पहले पंचायत चुनाव कराना मुश्किल माना जा रहा है, क्योंकि अभी तक अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आरक्षण को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो पाई है। ओबीसी आयोग की रिपोर्ट के बिना आरक्षण का निर्धारण संभव नहीं है, जिसके कारण चुनाव कार्यक्रम घोषित होने में देरी हो रही है। यदि समय पर पंचायत चुनाव नहीं कराए गए, तो राज्य की हजारों ग्राम पंचायतों को आर्थिक और प्रशासनिक नुकसान झेलना पड़ सकता है।

1900 करोड़ रुपये का केंद्रीय फंड रुकने की आशंका

विशेषज्ञों के अनुसार, पंचायत चुनाव समय पर नहीं होने की स्थिति में केंद्र सरकार की ओर से मिलने वाला करीब 1900 करोड़ रुपये का वित्तीय अनुदान प्रभावित हो सकता है। यह राशि ग्रामीण विकास और बुनियादी ढांचे से जुड़ी योजनाओं के लिए दी जाती है। पंचायतों का निर्वाचित ढांचा न होने पर इन फंड्स के उपयोग और वितरण में बाधा आ सकती है।

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ओबीसी आरक्षण बना मुख्य कारण

पंचायत चुनावों में ओबीसी आरक्षण लागू करने के लिए राज्य सरकार को आयोग की रिपोर्ट का इंतजार है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार आरक्षण तय करने के लिए ट्रिपल टेस्ट प्रक्रिया पूरी करना अनिवार्य है। इसमें पिछड़े वर्गों का डेटा, आयोग की सिफारिश और उसके आधार पर सीटों का निर्धारण शामिल होता है। जब तक यह प्रक्रिया पूरी नहीं होती, तब तक चुनाव की अधिसूचना जारी करना संभव नहीं माना जा रहा।

कई महत्वपूर्ण योजनाओं पर पड़ सकता है असर

यदि पंचायत चुनाव समय पर नहीं होते, तो ग्रामीण क्षेत्रों में चल रही कई योजनाओं पर असर पड़ सकता है। इनमें मुख्य रूप से—

  • ग्रामीण सड़क और आधारभूत ढांचा विकास योजनाएं

  • पेयजल और स्वच्छता से जुड़ी परियोजनाएं

  • पंचायत स्तर की विकास योजनाएं और स्थानीय बजट कार्य

  • सामाजिक सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार से जुड़ी योजनाओं का क्रियान्वयन

  • निर्वाचित पंचायत प्रतिनिधियों के अभाव में इन योजनाओं के क्रियान्वयन में प्रशासनिक दिक्कतें बढ़ सकती हैं।

    प्रशासनिक व्यवस्था पर भी दबाव

    चुनाव टलने की स्थिति में कई पंचायतों में प्रशासक नियुक्त करने पड़ सकते हैं। इससे स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है। ग्रामीण विकास कार्यों में जनप्रतिनिधियों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, इसलिए चुनाव में देरी से प्रशासनिक व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।

    सरकार और चुनाव आयोग की नजर रिपोर्ट पर

    राज्य सरकार और चुनाव आयोग दोनों की नजर अब ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पर टिकी हुई है। जैसे ही रिपोर्ट सरकार को सौंपी जाएगी, उसके आधार पर आरक्षण तय कर चुनाव कार्यक्रम घोषित किया जा सकता है।

    फिलहाल पंचायत चुनावों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है, लेकिन यदि देरी लंबी होती है तो इसका सीधा असर ग्रामीण विकास और पंचायतों को मिलने वाले केंद्रीय फंड पर पड़ सकता है।

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