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“राजस्थान का ये गांव बना मिसाल—बेटी के जन्म पर हर बार हरियाली का जश्न”

पिपलांत्री गांव ,राजसमंद राजस्थान ,111 पेड़ परंपरा ,बेटी जन्म पर पेड़ ,श्याम सुंदर पालीवाल ,महिला सशक्तिकरण ,पर्यावरण संरक्षण
पिपलांत्री गांव ,राजसमंद राजस्थान ,111 पेड़ परंपरा ,बेटी जन्म पर पेड़ ,श्याम सुंदर पालीवाल ,महिला सशक्तिकरण ,पर्यावरण संरक्षण

राजस्थान के राजसमंद जिले का छोटा सा गांव पिपलांत्री आज देश ही नहीं, दुनिया के लिए एक प्रेरणादायक उदाहरण बन चुका है। यहां एक अनोखी परंपरा ने समाज की सोच, पर्यावरण और बेटियों के भविष्य—तीनों को एक साथ मजबूत किया है।

इस पहल की शुरुआत गांव के पूर्व सरपंच श्याम सुंदर पालीवाल ने अपनी बेटी किरण की स्मृति में की थी। बेटी को खोने के दर्द को उन्होंने समाज के लिए एक सकारात्मक बदलाव में बदल दिया—और यहीं से जन्म हुआ एक ऐसी परंपरा का, जो आज एक आंदोलन बन चुकी है।

बेटी के जन्म पर 111 पेड़: खुशियों का हरित उत्सव

पिपलांत्री में जब भी किसी घर में बेटी का जन्म होता है, पूरा गांव मिलकर 111 पौधे लगाता है। यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि एक संकल्प है—बेटी और प्रकृति दोनों के संरक्षण का।

इन पौधों में मुख्य रूप से एलोवेरा, नीम और आंवला जैसे औषधीय और उपयोगी पौधे शामिल होते हैं, जो समय के साथ आय का स्रोत भी बनते हैं।

बेटियों की सुरक्षा और आर्थिक मजबूती का अनोखा मॉडल

यह पहल सिर्फ पेड़ लगाने तक सीमित नहीं है। गांव के लोग मिलकर नवजात बेटी के नाम पर लगभग ₹31,000 का फिक्स्ड डिपॉजिट भी करते हैं। इसके साथ ही परिवार से यह वादा लिया जाता है कि वे बेटी को अच्छी शिक्षा देंगे और बाल विवाह जैसी कुरीतियों से दूर रखेंगे।

इस व्यवस्था से बेटियों को आर्थिक सुरक्षा और बेहतर भविष्य की गारंटी मिलती है।

पेड़ों से रिश्ता: रक्षाबंधन पर राखी बांधती हैं बेटियां

पिपलांत्री की बेटियां अपने लगाए गए पेड़ों को केवल पेड़ नहीं मानतीं, बल्कि उन्हें अपने भाई की तरह मानकर हर साल रक्षाबंधन पर राखी बांधती हैं। यह परंपरा प्रकृति के साथ भावनात्मक जुड़ाव को दर्शाती है और संरक्षण की भावना को मजबूत करती है।

पर्यावरण और समाज दोनों को नई दिशा

इस पहल का असर आज साफ दिखाई देता है—

  • गांव में हजारों पेड़ लग चुके हैं

  • हरियाली में लगातार बढ़ोतरी हुई है

  • जल स्तर में सुधार आया है

  • और सबसे बड़ी बात—बेटियों के प्रति नजरिया पूरी तरह बदल गया है

  • जहां पहले बेटियों को बोझ समझा जाता था, वहीं अब उनके जन्म को उत्सव की तरह मनाया जाता है।

    इको-फेमिनिस्ट मॉडल: जहां हरियाली और बेटियों का सम्मान साथ बढ़ता है

    पिपलांत्री आज एक “इको-फेमिनिस्ट” मॉडल के रूप में जाना जाता है—जहां पर्यावरण संरक्षण और महिला सशक्तिकरण एक साथ चलते हैं। यह मॉडल देश के अन्य हिस्सों के लिए भी एक सीख बन चुका है।

    पिपलांत्री गांव की यह पहल साबित करती है कि यदि समाज ठान ले, तो छोटी सी शुरुआत भी बड़े बदलाव का कारण बन सकती है। बेटी बचाओ, पर्यावरण बचाओ—इन दोनों संदेशों को एक साथ जोड़कर इस गांव ने एक नई राह दिखाई है।

    👉 यह सिर्फ एक गांव की कहानी नहीं, बल्कि पूरे देश के लिए एक प्रेरणा है।

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