राजस्थान के मारवाड़ क्षेत्र में एक ओर जहां 21 अप्रैल को प्रधानमंत्री Narendra Modi द्वारा पचपदरा में रिफाइनरी प्रोजेक्ट से जुड़े बड़े कार्यक्रम की तैयारियां जोरों पर हैं, वहीं दूसरी ओर उसी इलाके के दर्जनों गांव भीषण पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। विकास और निवेश के बड़े दावों के बीच आम लोगों की बुनियादी जरूरत—पानी—अब सबसे बड़ी समस्या बन गई है।
रिफाइनरी के साए में प्यासा ग्रामीण इलाका
पचपदरा और आसपास के क्षेत्रों में करोड़ों-अरबों रुपये के निवेश और विकास की योजनाओं की चर्चा हो रही है। लाखों लोगों की भीड़ जुटाने की तैयारियां चल रही हैं, लेकिन इन तैयारियों के बीच क्षेत्र के ग्रामीणों की असल स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। गांवों में मीठे पानी की आपूर्ति 10 से 12 दिनों के अंतराल में हो रही है, जिससे लोग बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं।
कागजों में योजना, जमीन पर संकट
उम्मेदसागर-धवा-कल्याणपुर-समदड़ी-खंडप पेयजल योजना का उद्देश्य क्षेत्र में नियमित जलापूर्ति सुनिश्चित करना था, लेकिन हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। ग्रामीणों का कहना है कि पानी बहुत कम दबाव में और बेहद कम मात्रा में पहुंचता है, जिससे चार दिन की जरूरत का पानी भी मुश्किल से मिल पाता है।
इन गांवों में हालात सबसे ज्यादा खराब
समदड़ी, रामपुरा, महेश नगर, चिरडिया, खरंटिया, मजल, ढीढस, अजीत, पातों का बाड़ा, मोहनपुरा, गिराद का ढाणा, खेजड़ियाली और भलरों का बाड़ा सहित दो दर्जन से ज्यादा गांवों में जलापूर्ति बुरी तरह प्रभावित है। गर्मी की शुरुआत में ही स्थिति बिगड़ने से लोगों को आने वाले महीनों की चिंता सताने लगी है।

महंगा पानी खरीदने की मजबूरी
पानी की कमी के कारण ग्रामीणों को निजी टैंकरों से पानी खरीदना पड़ रहा है। एक परिवार को हर महीने करीब 2000 रुपये तक खर्च करने पड़ रहे हैं, जबकि एक टैंकर की कीमत लगभग 700 रुपये तक पहुंच गई है। इससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों पर भारी बोझ पड़ रहा है।
पशुपालकों की बढ़ी मुश्किलें
मारवाड़ क्षेत्र में पशुपालन आजीविका का प्रमुख साधन है, लेकिन पानी की कमी ने इस क्षेत्र के पशुपालकों को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। उन्हें यह तय करना मुश्किल हो रहा है कि सीमित पानी से परिवार की जरूरत पूरी करें या पशुओं की प्यास बुझाएं।
तीन साल से बिगड़ी व्यवस्था
कल्याणपुर क्षेत्र के कई गांवों में पिछले तीन वर्षों से जलापूर्ति की स्थिति खराब बनी हुई है। लोगों का कहना है कि नियमित पानी नहीं मिलने से रोजमर्रा के काम भी प्रभावित हो रहे हैं। हालात इतने खराब हैं कि कुछ जगहों पर पानी की चोरी और महंगे दामों पर टैंकर बेचने के मामले भी सामने आ रहे हैं।
प्रशासन पर उठे सवाल
ग्रामीणों का आरोप है कि संबंधित विभागों की लापरवाही और मॉनिटरिंग की कमी के कारण स्थिति और बिगड़ती जा रही है। कई बार शिकायत करने के बावजूद समाधान नहीं मिल रहा, यहां तक कि अधिकारी फोन तक नहीं उठाते।
ग्रामीणों की मांग—स्थायी समाधान जरूरी
स्थानीय लोगों ने प्रशासन से मांग की है कि पेयजल संकट का स्थायी समाधान किया जाए। इसके लिए पाइपलाइन की मरम्मत, जलापूर्ति की नियमित निगरानी और जरूरत पड़ने पर सरकारी टैंकरों की व्यवस्था सुनिश्चित करने की अपील की गई है।
मारवाड़ में जहां एक ओर रिफाइनरी को प्रदेश के विकास का प्रतीक बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर उसी क्षेत्र के लोग आज भी पानी जैसी बुनियादी जरूरत के लिए संघर्ष कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विकास की यह चमक तब तक अधूरी नहीं रहेगी, जब तक हर गांव तक पानी जैसी मूलभूत सुविधा नहीं पहुंचती?








