राजस्थान के डूंगरपुर जिले में 10 साल की मासूम बच्ची के साथ दुष्कर्म और निर्मम हत्या के मामले में एक बड़ा कानूनी फैसला सामने आया है। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने आरोपी को दी गई फांसी की सजा को बदलते हुए उसे शेष प्राकृतिक जीवन तक के लिए आजीवन कारावास (उम्रकैद) में परिवर्तित कर दिया है।
खंडपीठ में शामिल जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि अपराध अत्यंत जघन्य और अमानवीय जरूर है, लेकिन इसे “दुर्लभ से दुर्लभतम” (Rarest of Rare) श्रेणी में नहीं रखा जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह दर्दनाक घटना जून 2022 में डूंगरपुर जिले के सदर थाना क्षेत्र की है। एक 10 वर्षीय बच्ची अपने घर के आंगन में परिवार के साथ सो रही थी। देर रात कोई उसे चुपचाप उठाकर ले गया।
सुबह जब परिवार की नींद खुली तो बच्ची लापता थी। पूरे गांव में तलाश की गई, लेकिन कोई सुराग नहीं मिला। उसी दिन शाम को एक सुनसान रास्ते के पास पुलिया में बच्ची का खून से लथपथ शव मिला। इस घटना से पूरे इलाके में सनसनी फैल गई।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में खुलासा हुआ कि बच्ची के साथ पहले दुष्कर्म किया गया और फिर सिर पर भारी वस्तु से हमला करने के साथ गला घोंटकर उसकी हत्या कर दी गई।
जांच और गिरफ्तारी कैसे हुई?
पुलिस ने मामले में तेजी दिखाते हुए कुछ ही दिनों में आरोपी को गिरफ्तार कर लिया। जांच के दौरान कई महत्वपूर्ण साक्ष्य सामने आए—
एक गवाह ने आरोपी को घटना वाली सुबह पुलिया के पास देखा
दूसरे गवाह ने घटना से पहले आरोपी के साथ शराब पीने की पुष्टि की
आरोपी के घर से बरामद कपड़ों पर बच्ची का खून मिला
फॉरेंसिक जांच में पीड़िता और आरोपी के बीच संबंध साबित करने वाले अहम सबूत मिले
इन सभी परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) की कड़ी ने आरोपी के खिलाफ मजबूत केस तैयार किया।
हाईकोर्ट में क्या हुआ?
मामले की सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने कई सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि—
पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है
बरामदगी प्रक्रिया में स्वतंत्र गवाह नहीं थे
आरोपी घटना के बाद फरार नहीं हुआ
वहीं राज्य पक्ष ने इस अपराध को समाज की अंतरात्मा को झकझोर देने वाला बताते हुए फांसी की सजा को सही ठहराया।
कोर्ट ने क्यों बदली सजा?
हाईकोर्ट ने सभी साक्ष्यों और तर्कों का गहराई से विश्लेषण करने के बाद दोषसिद्धि को सही माना, लेकिन सजा में बदलाव किया। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा—
आरोपी का कोई पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है
यह उसका पहला अपराध है
वह परिवार का मुखिया है और उसके छोटे बच्चे हैं
इन तथ्यों के आधार पर अदालत ने माना कि यह मामला “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” की श्रेणी में नहीं आता, इसलिए मृत्युदंड उचित नहीं है।
हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि अपराध बेहद गंभीर और निंदनीय है, इसलिए आरोपी को “शेष प्राकृतिक जीवन” तक जेल में रहना होगा, यानी उसे सामान्य रिहाई का लाभ नहीं मिलेगा।
क्या है ‘रेयरेस्ट ऑफ रेयर’ सिद्धांत?
भारतीय न्याय प्रणाली में फांसी की सजा केवल उन्हीं मामलों में दी जाती है, जो पूरी तरह असाधारण और अत्यंत क्रूर हों तथा जहां अपराधी के सुधार की कोई संभावना न हो। इसे ही “Rarest of Rare” सिद्धांत कहा जाता है।
समाज और कानून के बीच संतुलन
यह फैसला एक बार फिर इस बहस को सामने लाता है कि जघन्य अपराधों में सजा का स्वरूप क्या होना चाहिए। एक ओर जहां पीड़ित पक्ष और समाज कड़ी से कड़ी सजा की मांग करता है, वहीं अदालत को कानून, साक्ष्य और मानवीय पहलुओं के आधार पर संतुलित निर्णय लेना होता है।
डूंगरपुर की इस दर्दनाक घटना में हाईकोर्ट ने दोषी को सजा से राहत नहीं दी, बल्कि उसे जीवनभर जेल में रखने का आदेश दिया है। यह फैसला बताता है कि अदालतें केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि कानूनी सिद्धांतों और तथ्यों के आधार पर निर्णय लेती हैं।








