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लालासर धाम से बिश्नोई समाज का राष्ट्रीयस्तर युवा का संगम और प्रतिभा सम्मान समारोह का महाकुंभ सपन्न

लालासर धाम से बिश्नोई समाज का राष्ट्रीयस्तर युवा का संगम और प्रतिभा सम्मान समारोह का महाकुंभ सपन्न
लालासर धाम से बिश्नोई समाज का राष्ट्रीयस्तर युवा का संगम और प्रतिभा सम्मान समारोह का महाकुंभ सपन्न

7 वर्ष की उम्र मे घर से आकर गुरु के चरणों मे सेवक बनने वाले संत स्वामी सच्चिदानंद जी आचार्य के जीवन तो वेसे संकट भरा रहा है बचपन मे जिस धाम मे आकार गुरु परंपरा धारण करने बिशनोई समाज के धर्मप्रचार प्रसार का मार्ग चुना वो बड़ा कठिन तो था ही उसके साथ ही संत जीवन मे भी केई चुनोतीयों का भी सामना करणा पड़ा |

किन चुनोतीयों का सामना करके लालासर धाम की पहेचान जन जन लाने का सफल प्रयास

स्वामी सच्चिदानंद जी आचार्य के गुरु रजिन्द्रानन्द जी जो बिशनोई समाज के संतों मे किताबी ज्ञान से रूबरू नहीं थे लकीन उनका भक्ति मे सच्ची लगन और काठोर तपस्या ही आज समाज के सामने हीरे तलासने का काम कर राही है स्वामी रजिन्द्रानन्द जी जिस काल खड मे लालासर साथरी आए थे उस समए ये क्षेत्र वीरान जंगल और ऐक डरावना क्षेत्र लगता था ना ही कोई मांदिर था और ना ही कोई उपयुकत रहेने की व्यवस्था थी बुजुर्ग गुरु की सेवा की सच्ची लग्न जम्भेश्वर भगवान की भक्ति उनके रोम रोम मे भारी हुई थी समाज की जिम्मेदार संस्था की अनदेखी की भेंट चढ़ा गुरु जम्भेश्वर भगवान का निर्वाण स्थल ऐक वीरान लगता था जिससे के मारे भक्तों का आना जान बाहुत कम था वहा बानी छोटी साथरी पर सिर्फ चुना करवाने के लिए कुछ लोग जरूर आया करते थे व्यक्त बदलता गया और रजिन्द्रानन्दजी के गुरु देव लोग गमन हो गए थे जो हरिद्वार यात्रा के दोरान हुवे थे जिनकी पार्थिव देह को हरिद्वार से लालासर लाने के लिए महंत रजिन्द्रानन्दजी जो ( स्वामी सचिदानंद जी ) के गुरु थे उनके पास पेसा तक नही थे विकत शंकट भरे इस भक्ति मार्ग पर चलते उन्होंने अपने गुरु का अंतिम संस्कार गुरु धाम लालासर लाकर कर दिया था लेकिन संत परंपरा की अगली अग्नि परीक्षा पार करने के लिए महंत रजिन्द्रानन्दजी के पास नही तो भडार करने की क्षमता थी ना ही वो ज्यादा पढे लिखे थे हा उनके लिए ऐक ही प्लस पॉइंट था की भगवान के प्रति सच्ची भक्ति और वीरान जगह पर अकेले रहेने की क्षमता जिसके चलते उन्हे लालासर महंत की उपादी देना संतों की मजबूरी बनी क्योंकि गुरु परम्परा के अन्य संत वहा आने के कोई ईछुक नहीं थे

स्व स्वामी रजिन्द्रानन्दजी के महंत बनने का बाद केसे बना समाज के लोगों की पहली पसंद लालासर धाम

स्वामी रजिन्द्रानन्दजी के महंत बनने का बाद लालासर धाम के प्रति समाज मे अलख जगाने का ऐक कठिन प्रयास उनके प्रचार पर्सार से आगे बढ़ने लगा और उनके जीवन का लक्ष्य था यहा भव्य मंदिर बनाने का लेकिन काम पढ़ाई उनके सामने दीवार बनकर खड़ी थी जिसको लांगना उनके लिए चुनोती भरा हुवा था | उन्होंने अपनी कमजोरी को ही ओजार बनाया और निकल पड़े बिशनोई बाहुलिये गावों मे और इस धाम का प्रचार करणा शुरू कर दिया क्योंकि उस समय मे नही था कोई सोशल मीडिया णा ही टीवी पर विज्ञापन देने का ज्ञान था अब उन्होंने उतरी व पशिमि भारत के हर बिशनोई के घर जाकर उसको धाम का महत्व बताने और मेलों मैं धाम आने का निवेदन करते अपनी यात्रा को जारी रखा जिसमे समाज के लोगों द्वारा उन्हे दान दक्षिणा के रूप मे कुछ पेसे भि दिए जाते थे लेकिन उनहोने पेसे नहीं लेकर समाज से अनाज रूपी दान लेना शुरू किया वो भी दान मे मिला अनाज वापिस मेले मे आने वाले यात्रियों को भोजन करवाने के मे काम लेते गये और समाज जुड़ता गया और लोगों की पहली पसंद बना लालसर निर्वाण स्थली धार्मिक स्थल के रूप मे क्योंकि कंकेडियो के बीच का रमणीक स्थल किसी स्वर्ग से कम नाही था लेकिन देखरेख और लोगों की आवाजाही के आभाव मे लोग वहा जाना कम् पसंद करते थे अगर कोई जाता था तो भी वो वहा रुकता नही था

अनपढ़ गुरु ने तलासा हीरा जो युवाओ के लिए बन गये प्रेरणा श्रोत

स्व. स्वामी रजिन्द्रानन्दजी ने अपनी यात्रा के दोरान वो समाज के लोगों मे रुकते थे और एकदिन उनका विश्राम मोजूदा महंत स्वामी सचिदानंद जी के घर होता है और भोजन के उपरांत गुरु ने दक्षिणा के रूप मैं स्वामी सचिदानद ( मोजूदा नाम ) जो उस समय मात्र सात वर्ष के लागभग उम्र के थे को मांग लिया अब परिवार ने भी गुरु जी से आशिर्वाद लेते हुवे लालासर धाम के चरणों मे सचिदानंद जो सुपुर्द कर दिया था अब गुरु को चेला तो मिल गया लेकिन खुद शिक्षा से वंचित तो जरूर थे लेकिन अपने चेले को उतम गुरु परम्परा की शिक्षा दिवायी साथ ही समाज के नेताओ और भांमाशाहों से मंदिर निर्माण के लिए हर मेले मे निवेदन करते रहे गुरु महाराज से आशिर्वाद से मंदिर तो बन गया| उस समाय तक धाम के पास ज्यादा धन नाही होने के कारण संस्था कुछ कर्जदार भी हो गाई लेकिन गुरु जम्भेश्वर भगवान का निर्वाण स्थल मानो लगो के लिय स्वर्ग का रूप हो समाज की आवाजाही बढ़ने लगी अनवरत चलता भंडारा और धर्मशालों की बढ़ती डिमांड ये सब लक्ष्य लिए हुवे अपने चेले की शिक्षा अमपूर्ण होने का इतजार करते लालासर महंत स्व. स्वामी रजिन्द्रानन्दजी ने हीरे की रूप मे पाया मोजूदा महंत स्वामी सचिदानद को और शिक्षा पूर्ण होते ही अछि गायन कला और कथा के माध्यम से भक्ति रस बरसाने की उनकी काम उम्र को कभी लोगों को भान ही नहीं होने दिया और लालासर निर्वाण स्थल को चार चाँद लगाने मे गुरु के साथ जुट गये और जो आज आप और हमारे समाने बनकर ऐक स्वर्ग की अनुभूति करवाने वाला तीर्थ स्थल लालासर साथरी

गुरु के आदेशो को सिर आखों पर रख आज बने युवाओ के प्रेरणा श्रोत महंत स्वामी सचिदान्द जी

समाज मे धार्मिक प्रचार के साथ साथ युवाओ को प्रेरणा देने और सफलता की ऊंचाइया चुने वाले युवाओ को समाज के बीच लाने के लिए युवा सेम्मलन के रूप मे लालासर धाम से समाज की शानदार शुरुवात की जिसको आज समाज के मंचो को कॉपी करना उनकी मजबूरी बन गई है ऐसे महान कार्यकर्म की शुरुआत लालासर धाम से हुति और हर वर्ष ऐसे ही कार्यकर्म आयोजित होते रहते है अपने गुरजी स्वर्गीय राजेन्द्रनन्द जी के देव लोक गमन के बाद के बाद लालासर धाम की माहिमा को हमेशा चार चाँद लगाने के लिय और उवाओ मे नई ऊर्जा भरने के उदेश्य से आयोजित आसोज मेले की पूर्व संध्या पर गुरु जंभेश्वर भगवान की निर्वाण स्थली लालासर साथरी में युवा संगम और प्रतिभा सम्मान समारोह का विशाल आयोजन हुआ । महंत स्वामी सच्चिदानंद जी आचार्य के पावन सान्निध्य में और डॉक्टर एलआर बिश्नोई ( डीजीपी मेघालय ) के मुख्य आथित्य में बिश्नोई समाज की विभिन्न क्षेत्रों की 300 से अधिक युवा प्रतिभाओं को सम्मानित किया गया । युवा संयोजक और टीम आग़ाज़ फाउंडेशन के संस्थापक अभिषेक बिश्नोई ने बताया की समाज विकास में युवाओं की सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए गाँव ढाणी से निकली प्रतिभाओं को सम्मान और मंच देना समाज का कर्तव्य है । सहभागिता और नवाचार के वैचारिक आधार पर स्वामी सच्चिदानंद जी के मार्गदर्शन में युवा शक्ति के लिए हर वर्ष आयोजन होता है । मुख्य अतिथि डॉक्टर एलआर बिश्नोई ( डीजीपी मेघालय ) ने बेहद प्रभावशाली उदाहरणों के साथ जीवन में अनुशासन के महत्व को समझाया और शब्दवाणी को समझने और अनुकरण पर युवाओं से चर्चा की । एशियन गेम्स में ब्रोंज मेडल विजेता रेशलर किरण बिश्नोई ने समाज की बेटियों को खेल क्षेत्र में बढ़ने को प्रेरित किया। आरजेएस मोनिका सिंवर ने माता पिता को बेटी को और ससुराल वालो को बहू को पढ़ाई में सपोर्ट करने का आह्वान किया । आईईएस अरविंद बिश्नोई और सोमराज बिश्नोई ने कम संसाधनों में पढ़ाई , इंटरनेट के सदुपयोग पर विचार रखे । युवा आविष्कारक रवींद्र बिश्नोई ने युवा व्यवसाय में कैसे प्रगति करे , इस पर चर्चा कि ।अंडर 15 रेशलर अश्विनी बिश्नोई ने स्कूल के साथ साथ खेल को भी बराबर महत्व देने की बात कही । मंच संचालन संदीप धारणिया और रामस्वरूप ने किया ।समारोह में सरकारी सेवा , व्यव्यसाय , आईआईटी/ नीट , स्पोर्ट्स , मेडिकल संबंधित क्षेत्रों के हज़ारो युवा उपस्थित रहे 

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