जहां ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच तनाव तेजी से बढ़ गया है। तेहरान ने वाशिंगटन के तथाकथित 15 सूत्री शांति प्रस्ताव को सिरे से खारिज करते हुए इसे “हमले की साजिश” बताया है, जिससे कूटनीतिक रिश्ते और अधिक बिगड़ते दिख रहे हैं।
ईरान का दो टूक संदेश: दबाव या अपमान स्वीकार नहीं
ईरान के संसद अध्यक्ष मोहम्मद बगेर ग़ालिबफ़ ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि उनका देश किसी भी तरह के अंतरराष्ट्रीय दबाव या अपमान के आगे नहीं झुकेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका और इज़राइल कूटनीति के नाम पर सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर रहे हैं।
ग़ालिबफ़ ने यह भी संकेत दिया कि ईरानी सेना पूरी तरह तैयार है और देश अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हर कदम उठाएगा।
“फॉल्स फ्लैग ऑपरेशन” की चेतावनी
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता जताते हुए कहा कि ईरान के खिलाफ “False Flag Operations” हो सकते हैं। उनके अनुसार, कुछ ताकतें अन्य देशों को इस संघर्ष में घसीटकर स्थिति को और गंभीर बना सकती हैं, जो अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ होगा।
अमेरिका का 15-पॉइंट प्लान और कूटनीतिक दबाव
दूसरी ओर, अमेरिकी नेतृत्व की ओर से मार्को रुबियो ने जी7 बैठक के बाद बयान दिया कि ईरान के सामने 15 सूत्री प्रस्ताव रखा गया है।
इस प्रस्ताव में मुख्य रूप से ईरान के परमाणु कार्यक्रम, क्षेत्रीय गतिविधियों और सैन्य प्रभाव को सीमित करने की शर्तें शामिल हैं।
पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की “मैक्सिमम प्रेशर” नीति का असर अभी भी इस रणनीति में साफ नजर आता है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा फ्लैशपॉइंट
इस पूरे संकट के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है।
यह दुनिया के सबसे अहम तेल आपूर्ति मार्गों में से एक है। अगर यहां तनाव बढ़ता है, तो वैश्विक तेल बाजार, व्यापार और सप्लाई चेन पर बड़ा असर पड़ सकता है।
क्या बढ़ सकती है जंग?
मौजूदा हालात को देखते हुए स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है।
ईरान बातचीत से ज्यादा प्रतिरोध के मूड में दिख रहा है
अमेरिका दबाव और कूटनीति दोनों का इस्तेमाल कर रहा है
इज़राइल भी हालात पर कड़ी नजर रखे हुए है
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले 24–48 घंटे बेहद अहम होंगे, क्योंकि ईरान की ओर से इस प्रस्ताव पर आधिकारिक जवाब आ सकता है। अगर बातचीत विफल रहती है, तो यह तनाव बड़े सैन्य संघर्ष में बदल सकता है।
फिलहाल, मिडिल ईस्ट एक बार फिर अनिश्चितता के दौर में खड़ा है। कूटनीति और ताकत के इस टकराव में अगर संतुलन नहीं बना, तो इसका असर सिर्फ क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ेगा।








